Tuesday, October 16, 2018

नवरात्र में बनारस बन जाता है मिनी बंगाल

                             

        नवरात्र में बनारस बन जाता है मिनी बंगाल

पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा दुनिया भर में मशहूर है इसमें शक नहीं है लेकिन वाराणसी में भी दुर्गापूजा की रौनक पश्चिम बंगाल से जरा भी कम नहीं होती । बड़े-बड़े लाउडस्पीकर में बजते नवरात्र के गाने  किसी दूसरे के लिए शोर हो सकते हैं लेकिन वे बनारस के लिए रस धार की तरह होते हैं । नवरात्र पर बनारस की सड़कों और गलियों में लगी झालर और बत्तियां बत्तियां ऐसी लगती हैं मानों सूरज अलग-अलग रंगों में आंख मिचौली खेल रहे हों । बनारस में 1000 से ज्यादा छोटे-बड़े पंडाल और दुर्गा मूर्तियां प्रतिस्थापित की जाती हैं। इनमें से कई पंडाल और दुर्गा प्रतिमाएं बेहद ही आकर्षक और खूबसूरत होती हैं ।

सार्वजनिक दुर्गोत्सव समिति, टाउन हॉल

बनारस के प्राचीन दुर्गा पूजा में से एक है सार्वजनिक दुर्गोत्सव समिति की दुर्गा पूजा । टाउन हॉल के हॉल में लगने वाली इस दुर्गा पूजा की कई खासियत है । नवरात्र के पहले ही दिन मूर्ति की स्थापना की जाती है । पूरे दुर्गा पूजा के दौरान टाउन हॉल का हॉल किसी मंदिर की तरह बन जाता है, जहां लोग चप्पल उतारकर दर्शन करने जाते हैं । इस दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी पहचान थी यहां लगने वाली मूर्तियों की सुंदरता, वैसे तो हर दुर्गा जी की मूर्ति सुंदर होती है लेकिन यहां की मूर्ति का मुकाबला कहीं से नहीं किया जा सकता । मन करता था कि नौ दिन तक टाउन हॉल में ही रहूं और दुर्गा जी के सामने रहूं । टाउन हॉल की मूर्ति बनाते हैं विश्वनाथ मूर्ति कला केंद्र । फिलहाल 2015 के विवाद से टाउन हॉल ने बड़ी और मिट्टी की मूर्ति लगाने की परंपरा बंद कर दी । मुझे इसका झटका लगा । सार्वजनिक दुर्गोत्सव समिति की एक और खासियत है नौ दिनों तक चलने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम । साल 2004 तक सुबह और रात को श्रीकृष्णलीला का मंचन होता था लेकिन अब 9 दिनों तक भजन गायक अपनी प्रस्तुति देते हैं । इसके साथ टाउन हॉल के मैदान में मेला भी लगता है । 
सार्वजनिक दुर्गोत्सव समिति की ओर से लगाई गई मां की प्रतिमा

प्रीमियर ब्वॉयज क्लब, हथुआ मार्केट

बनारस का ये सबसे बड़ा दुर्गा पूजा क्लब है । इस क्लब की पहचान है इसका भव्य पंडाल सेट । साल दर साल हथुआ मार्केट का पंडाल अपनी भव्यता और विशेषता से लोगों को अंचभित कर देता है । मुझे अच्छे से याद है कि एक वर्ष पंडाल के रूप में करीब 100 फुंट ऊंचा शिवलिंग रूपी पंडाल बना था और उस शिवलिंग पर पानी गिरता रहता था । इसी तरह एक वर्ष पंडाल के रूप में श्रीकृष्ण का अर्जुन को उपदेश देते वक्त वाला दृश्य बना था । इस साल फिल्म बाहुबली के भव्य महल का पंडाल तैयार किया गया है । हर साल नंबर एक पंडाल का पुरस्कार प्रीमियम ब्वॉयज क्लब को ही मिलता है।
प्रीमियर ब्वॉयज क्लब - बाहुबली के महल जैसा पंडाल

विजेता स्पोर्टिंग क्लब, लहुराबीर

हथुआ मार्केट के सामने पुलिस लाइन में भी भव्य पंडाल बनता था और भव्य मूर्ति लगती थी जो पंडाल के मामले में दूसरे नंबर पर रहता था लेकिन अब यहां पर पुलिस कार्यालय बन गया है, जिसकी वजब से यहां पर अब दुर्गा प्रतिमा नहीं सजती । 

बाबा मच्छोदरानाथ दुर्गोत्सव समिति

मच्छोदरी पार्क में लगने वाली ये दुर्गा पूजा भी बनारस की सबसे भव्य दुर्गा पूजाओं में से एक है । यहां की खासियत होती है इसका भव्य पंडाल । देश के प्राचीन स्मारकों और मंदिरों की प्रतिकृति यहां पंडाल के रूप में दिखते रहे हैं । 
बाबा मच्छोदरानाथ समिति में बना पंडाल

मां बागेश्वरी देवी दुर्गा पूजा क्लब,जैतपुरा

बागेश्वरी देवी मंदिर परिसर में लगने वाली इस दुर्गा पूजा ने अपनी अलग ही पहचान बनाई है । इस पूजा समिति की खासियत होती है इसकी प्रतिमा जो हर बार लोगों को चौंकने पर मजबूर कर देती है । दरअसल यहां पर दुर्गा मूर्ति मिट्टी की बजाए किसी विशेष पदार्थ से बनाई जाती है । कुछ पुराने उदाहरण बता रहा हूं एक साल अमेरिकी डायमंड की मूर्ति, एक साल तांबे की मूर्ति, एक साल पेंसिल, रबड़ और कटर की मूर्ति, एक साल आग की मूर्ति (जी हां आग की मूर्ति सिलेंडर गैस पाइप से कनेक्टन थी और मूर्तियों में आग जलते थे)।  इस क्लब की मूर्तियों ने हमेशा लोगों को आकर्षित किया है ।
इसके अलावा सनातन धर्म इंटर कॉलेज में लगने वाली दुर्गा पूजा की भव्यता भी देखने लायक होती है । यहां की मूर्ति भी विशेष होती है।

ईगल क्लब, जंगमबाड़ी 

बंगाली समाज द्वारा जंगमबाड़ी मठ के सामने ईगल क्लब की दुर्गा मूर्ति स्थापित की जाती है, यहां की मूर्ति बेहद सुंदर होती हैं । यहां की मूर्ति की एक खासियत होती है कि यहां मां जगजननी हमेशा क्रोधित रूप में दिखती हैं और उनके सिर पर मुकुट नहीं होता ।
जगतगंज पर लगने वाली दुर्गा प्रतिमा की पहचान सड़क पर होने वाली लाइटिंग से है । इतना ही नही यहां पर इलेक्ट्रिक दुर्गा पूजा होती है, 10 मिनट का शो होता है । जिसमें दुर्गा जी के हाथों से त्रिशूल निकलकर महिषासुर को जाकर लगता है ।
बनारस शहर में प्रहलादघाट, पांडेयपुर, अर्दलीबाजार में भी आकर्षक और भव्य पंडाल बनाए जाते हैं और छोटी-छोटी सैकड़ों मूर्तियां गली मोहल्लों में लगती हैं । सप्तमी, अष्टमी और नवमी पर शाम के बाद आधा बनारसर शहर सड़कों पर होता है । कई परिवार तो रात के 12 बजे घुमने निकलते हैं । वाराणसी के आस-पास पड़ाव और मुगलसराय में भी बेहतरीन दुर्गा मूर्तियां और पंडाल लगते हैं । वाराणसी में दुर्गा पूजा एक ऐसा त्योहार जो लोगों को आपस जोड़ता तो है ही साथ ही उससे एक मिनी अर्थव्यवस्था भी फलती फूलती है जिससे हजारों लोगों की रोजी रोटी चलती है । 

Tuesday, October 9, 2018

मां गंगा के लिए आधुनिक भगीरथ हैं वो...



"न किसी ने मुझे भेजा है और ना मैं यहां आया हूं मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है"


2014 लोकसभा चुनाव के दौरान वाराणसी से पर्चा भरने से ठीक पहले नरेंद्र मोदी ने यही वाक्य कहा था । गंगा मईया की कृपा से वाराणसी से नरेंद्र मोदी को प्रचंड जीत मिली और पूरे देश में बीजेपी को प्रचंड बहुमत । बंपर जीत के बाद पीएम मोदी पर जिम्मेदारी थी कि वो गंगा मईया के उपकारों को कैसे चुकाएं । पीएम मोदी ने मां गंगा की सेवा करने का बीड़ा उठाया है । बीते साढ़े 4 साल में बनारस में गंगा के लिए वाराणसी के सांसद और प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ किया उतना तो इतने कम अंतराल में कभी नहीं हुआ ।
  वाराणसी में जीत के बाद पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे पहला काम मां गंगा को नमन करने का ही किया । उन्होंने मां गंगा की आरती की । इसके बाद दो ऐसे मौके आए जब पीएम मोदी अपने दो दोस्तों को गंगा किनारे लेकर आए । सबसे पहले दिसंबर 2015 में जापान के पीएम शिंजो आबे को वाराणसी ले आए और उन्हें गंगा की आरती दिखाई । इसके बाद इसी साल मार्च में प्रधानमंत्री मोदी अपने दोस्त फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को वाराणसी के घाटों की सैर करवाई और वो भी नाव पर बिठाकर ।



  जहां तक मेरी याददाश्त है मेरे सामने इससे पहले कभी किसी बड़े देश का राष्ट्राध्यक्ष वाराणसी नहीं आया था । बहरहाल ये बात घुमने घूमाने की हुई है लेकिन सवाल है कि गंगा के लिए उन्होंने अब तक क्या किया तो चलिए आपको गिनाते हैं पीएम मोदी के द्वारा शुरू कराए गम काम ।
  1.  वाराणसी के 84 घाटों पर हाई मास्ट बल्ब जलते थे जिनसे पीली छटाएं निकलती थीं जिससे रात में भी घाटों की सुंदरता निखरती थी । पीएम मोदी ने बिजली बचाने के लिए घाटों के बल्ब को एलईडी से बदलवाए । ये एलईडी सफेद रंग की रोशनी देते थे । वाराणसी शहर के लोगों ने इसकी शिकायत पीएमओ तक की, जिसके तुरंत बाद सफेद एलईडी लाइटों को पीली एलईडी लाइटों से बदलने में देर नहीं किया गया ।
  2. गंगा नदी में सीवर का पानी गिरता है इसमें कोई शक नहीं है बनारस में पहले से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट है लेकिन बनारस शहर से निकलने वाली गंदगी के हिसाब से उसकी क्षमता नहीं है । इसीलिए पीएम मोदी ने बनारस शहर के लिए तीन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को मंजूरी दी । सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से शहर के नालों का पानी साफ होगा और फिर उस साफ पानी को या तो गंगा में बहाया जाएगा या फिर उसे किसानों की खेतों तक पहुंचाया जाएगा।

-         3 नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बन रहे हैं

  •   दीनापुर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट – ये बनारस का सबसे बड़ा सीवर के पानी को साफ करने का प्लांट होगा । इसका काम 80 फीसदी तक पूरा हो चुका है ।
  • इसके बाद गोइठहा में भी सीवेज ट्रीटमेंट का काम पूरी रफ्तार से चल रहा है । दिसंबर तक इसका काम काम पूरा हो जाएगा।
  • इसके अलावा रमना में भी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का काम तेजी से चल रहा है ।

-               ये तीन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ऐसी जगहों पर बनाए जा रहे हैं जिससे पूरा शहर इसके जरिए कवर हो जाए । 
  
-                     इन तीनों ही सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के बन जाने से शहर के गंदे नालों का पानी सीधे ट्रीटमेंट प्लांट में गिरेगा और पानी साफ होगा।
  • पीएम मोदी ने गंगा की सफाई करने के लिए डेढ़ करोड़ की लागत से एक अमेरिकन मशीन, जिसे ट्रैस स्कीमर कहते हैं, काशी को दी है । ये मशीन गंगा की ऊपरी सतह से गंदगी की सफाई करती है ।
    गंगा में सफाई करती ट्रैस स्कीमर मशीन
  •  गंगा को साफ करने का अलावा पीएम मोदी की इच्छा है कि नदी मार्ग का विकास हो जिससे यातायात का एक नया साधन बने साथ ही औद्योगिक सामान भी गंगा के जरिए पहुंचे । इसी के तहत पश्चिम बंगाल के हल्दिया से लेकर वाराणसी तक एक जलमार्ग का निर्माण हो रहा है । रामनगर के पास इसके लिए बकायदा एक बंदरगाह तैयार हो रहा है । जहां हल्दिया से आया माल उतरेगा और सड़क मार्ग से आगे जाएगा ।
  • अगले छह महीने के भीतर गंगा नदी के जरिए इलाहाबाद तक जाने का साधन भी उपलब्ध होगा सड़क परिवहन और जल संसाधन मंत्रालय की ओर से ।
  •  इन सबके अलावा अस्सी घाट की स्वच्छता और उसे नया रूप देना भी पीएम मोदी की ही देन है । पहले अस्सी पर चाय की दुकान पर अड़ी लगती थी लेकिन अब लोग अस्सी घाट पर शाम को वक्त बीताना पसंद करते हैं ।
    अस्सी घाट से गंगा का नजारा
  • मोदी सिर्फ गंगा नदी के प्रति ही गंभीर नहीं हैं बल्कि उन्हें शहर के प्रसिद्ध तालाब और कुंडों की भी उतनी ही परवाह है तभी जो दुर्गाकुंड का बदला स्वरूप उन्हीं की देन है । जहां शाम होते ही अब बैठने का मन करता है । इसके अलावा शहर के दूसरे प्राचीन तालाबों को भी हृदय योजना की तरह सजाया-संवारा गया है ।

  • रात के समय दुर्गाकुंड तालाब का एक दृश्य

 पीएम मोदी के साथ-साथ केंद्रीय सड़क परिवहन और जल संसाधन मंत्री भी उनके साथ इस  काम में जी जान से जुटे हुए हैं । काशी में गंगा के पुर्नउद्धार के लिए जितने भी काम चल रहे हैं वो सभी 2014 के बाद से शुरू हुए हैं । ऐसे में ये कहना बिल्कुल ही जायज  होगा कि नर्मदा नदी के राज्य का एक इंसान वाकई गंगा के लिए आधुनिक भागीरथ साबित हो रहा है । 

 हर हर गंगे


Monday, October 1, 2018


         काशी का नाम मुहम्मदाबाद रखने की भी साजिश हुई थी



द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से है एक काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की महिमा अपरंपार है । काशी के कण कण में शंकर विराजते हैं । काशी तो स्वयं भोलेनाथ के त्रिशूल पर बसी है। ऐसी मान्यता है कि प्रलय आ जाए तो भी काशी नष्ट नहीं होगी । दुनिया के जीवित सबसे पुराने शहर...काशी की पवित्रता पर कई बार चोट भी पहुंचाने की कोशिश की गई और इसमें मुस्लिम शासकों का हाथ था ।

काशी विश्वनाथ मंदिर पर औरंगजेब ने सन 1669 में आक्रमण कर उसे काफी नुकसान पहुंचाया था । औरंगजेब ने मंदिर को ध्वस्त करवा दिया और मंदिर की सिर्फ एक दीवार छोड़ दी और उसी जगह मस्जिद खड़ी करवा दी । उस दौरान मंदिर के पुरोहितों ने शिवलिंग को बचाने के लिए उसे ज्ञानवापी कुएं में छिपा दिया था । मस्जिद से सटी मंदिर की एक दीवार अब भी मौजूद है, जो काशी विश्वनाथ मंदिर की सत्यता को उजागर करता है, हालांकि सुरक्षा घेरा होने के कारण वहां अब लोगों को जाने नहीं दिया जाता । विश्वनाथ मंदिर में लगी नंदी बैल की मूर्ति का मुख अभी भी उसी दिशा में है, जहां अब ज्ञानवापी मस्जिद है । हिंदू धर्म में मान्यता है कि शिवलिंग की दिशा में ही नंदी का मुख है । ऐसे में ये दो मुख्य सबूत बताने के लिए काफी हैं कि प्राचीन विश्वनाथ मंदिर उसी जगह पर मौजूद था, जहां आज मस्जिद है ।
नंदी के पीछे दिख रहा वर्तमान विश्वनाथ मंदिर

ऐसा कहा जाता है कि मुस्लिम आक्रांता औरंगजेब ने काशी का नाम बदल दिया था । उसने इस पवित्र शहर का नाम मुहम्दाबाद रख दिया था, लेकिन काशी की पवित्रता के आगे वो नाम चलन में नहीं आ सका ।

मौजूदा विश्वनाथ मंदिर

तस्वीरों में आप जो विश्वनाथ मंदिर अभी देखते हैं उसका निर्माण प्राचीन विश्वनाथ मंदिर से कुछ दूरी पर किया गया है । साल 1777 में इंदौर की राजकुमारी अहिल्याबाई होलकर ने मौजूद मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर के शिखर पर सोने की चादरें बिछाई गई हैं जिसे पंजाब के राजा रणजीत सिंह ने दान में दिया था । महाराजा रणजीत सिंह ने 22 टन सोने से मंदिर के शिखरों को स्वर्ण मंडित कराया था ।

ऐसा नहीं है कि विश्वनाथ मंदिर पर आक्रमण करने वाला औरगंजेब पहला आक्रांता था । इससे पहले भी कई बार विश्वनाथ मंदिर पर आक्रामण किए गए । इतिहासकारों के मुताबिक सन् 1194 में मुहम्मद गोरी ने विश्वनाथ मंदिर को लूटने के बाद तुड़वा दिया था । इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया।  सन् 1585  में राजा टोडरमल की सहायता से पंडित नारायण भट्ट ने इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। जिसके बाद औरंजगेब ने 1669 में आदेश देकर विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया था और उसके सैनिकों ने प्राचीन काशी विश्वनाथ मंदिर को गिराकर उस जगह मस्जिद बना दी ।
ज्ञानवापी मस्जिद और उसकी एक दीवार

मौजूदा काशी विश्वनाथ मंदिर के पास आज जो मस्जिद है उसे ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है, जबकि स्कंद पुराण के काशी खंड में ज्ञानवापी को तीर्थ कहा गया है । ज्ञानवापी शब्द ज्ञान+वापी से मिलकर बना है जिसका मतलब होता है ज्ञान का तालाब या ज्ञान का कुंड ।

वैसे काशी और उसके नाथ यानी विश्वनाथ की महिमा अनंत और अपरंपार है । मंदिर और मस्जिद के विवाद से अलग एक बात जो शाश्वत सत्य है कि काशी सदियों से लोगों की आस्था और अध्यात्म का केंद्र रही है और आगे भी रहेगी...क्योंकि शिव में काशी है..काशी में शिव है ।

(लेख में सभी तथ्यों का चयन बेहद गंभीरता पूर्वक किया गया है)

Thursday, September 27, 2018


न बिजली, न लाउडस्पीकर फिर भी दुनिया की सबसे प्रसिद्ध रामलीला

राम लक्ष्मण भरत सीता और शत्रुघ्न

तालाब किनारे रामलीला का मंचन



गोधूलि बेला है...यानी उजाला खत्म होने की ओर है और अंधेरा दस्तक दे रहा है। मैदान में बने एक चौड़े चबूतरे पर पेट्रोमैक्स(गैस से जलने वाला लालटेन) रखा है, चबूतरे के नीचे मैदान में लोगों की भीड़ इकट्ठा है । भीड़ में कुछ लोगों के हाथ में रामचरितमानस की किताब है तो कोई अपने साथ जमीन पर बिछाने के लिए दरी लेकर आया है । थोड़ी देर में चबूतरे पर बाल स्वरूप में राम, सीता और लक्ष्मण का आगमन होता है और पूरे माहौल में जय श्रीराम और हर-हर महादेव के उद्घोष होने लगते हैं । पूरा वातावरण राम और शिवमय हो जाता है...और फिर शुरू होता है रामायण का प्रसंग । ये जगह है काशी की राजधानी रामनगर और मंच है रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला का ।
 काशी के दक्षिण में गंगा नदी के पार रामनगर है, रामनगर में ही काशी नरेश रहते हैं । इसीलिए इसे काशी की राजधानी भी कहते हैं । यहीं पर सन 1783 में काशी के तत्कालीन राजा महाराज उदित नारायण सिंह ने रामलीला शुरू करवाई थी, जो अब पूरी दुनिया में विख्यात है ।

रामलीला में जाते काशी नरेश अनंत नारायण सिंह

क्यों विख्यात है रामनगर की रामलीला ?

आज के दौर में जब दिल्ली की रामलीला में हनुमान को हवा में उड़ाने के लिए क्रेन और रावण की सोने की लंका दिखाने के लिए बहुत बड़ी एलईडी टीवी के साथ-साथ टीवी जगत के कलाकारों का इस्तेमाल हो रहा हैं । वहीं रामनगर की रामलीला देखकर लगेगा कि हम उस सदी में हैं जहां बिजली ही नहीं है । यहां की लीला पेट्रोक्स या मशाल की रोशनी में की जाती है । ऐसा नहीं है कि सिर्फ शाम को रामलीला होती है दिन में भी रामलीला का मंचन होता है । खास बात ये है कि रामलीला में किसी माइक या लाउडस्पीकर का प्रयोग भी नहीं किया जाता । रामलीला के पात्र ऐसे संवाद करते हैं कि आवाज 50 मीटर दूर बैठे व्यक्ति तक आसानी से पहुंच जाए । रामनगर की रामलीला की सबसे खास बात है उसके पात्र  । इसके पात्र 16 साल से कम उम्र के चुने जाते हैं । राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के पात्र तो ब्राह्मण ही चुने जाते हैं । रामलीला में लड़कियां हिस्सा नहीं लेती उनका किरदार भी लड़के ही निभाते हैं ।  मुख्य पात्रा रामलीला की तैयारी के समय से संन्यासी सा जीवन व्यतीत करते हैं ।

रामलीला की भाषा

वैसे तो बनारस की भाषा बनारसी भोजपुरी है लेकिन रामनगर की रामलीला अवधी भाषा में होती है । पात्रों को इसके लिए काफी पहले से प्रशिक्षण दिया जाता है । प्रशिक्षण के समय पात्रों से संस्कृति के श्लोक भी पढ़वाए जाते हैं, ताकि शुद्ध उच्चारण हो ।

रामलीला पात्रों के वस्त्र-अस्त्र

रामलीला के पात्रों के वस्त्र साधारण रामलीला जैसे चमकदार नहीं होते। उनकी सुंदरता अलग सी ही दिखती है । श्रृंगार में प्रयोग होने वाले आभूषण सोने-चांदी के होते हैं । वस्त्र, आभूषण और अस्त्र-शस्त्र काशी नरेश के किले में ही रखे जाते हैं। रामलीला के पात्रों को सजाने के लिए किसी केमिकल वाले सामान का प्रयोग नहीं होता और न ही किसी कंपनी के ब्रांडेड मेकअप का । चंदन और कुमकुम रंगों से ही रामलीला के पात्रों को सजाया जाता है ।

हर अध्याय के लिए अलग जगह

रामचरितमानस में अयोध्या, चित्रकूट, लंका, अशोक वाटिका  और पंचवटी का वर्णन होता है । इसीलिए रामनगर के 4 किलोमीटर के दायरे में इन नामों से जगह ही बना दिए गए हैं । जिस जगह का अध्याय उसी जगह पर आयोजित होता है । रामलीला के पात्रों कंधे पर बैठकर एक जगह से दूसरी जगह लाया और ले जाया जाता है ।

कब शुरू होती है रामलीला

वैसे तो रामलीला की तैयारियां सावन महीने से शुरू हो जाती है लेकिन पहला मंचन भादो महीने में अनंत चतुर्दशी के दिन से होता है । उस दिन काशी नरेश स्वयं राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के बालस्वरूप की पूजा करने हाथी पर सवार होकर आते हैं। काशी नरेश स्वयं भगवान के बालस्वरूप की आरती उतारते हैं । रामनगर की रामलीला अश्विन महीने की शुक्ल पूर्णिमा तक चलती है ।
कंधे पर राम लक्ष्मण सीता को ले जाते ब्राह्मण


दुनिया की आधुनिकता से दूर ये रामलीला आज भी अपने मूलस्वरूप में चल रही है । बनारस के फक्कड़ मिजाज लोग आज भी रामनगर की रामलीला में जाना नहीं भूलते । रामनगर में रामलीला देखना और वहीं पर लिट्ठी चोखा बनाकर खाना ठेठ बनारसियों की सालों पुरानी आदत है ।
चंदन का टीका लगाते दर्शक
रामनगर की रामलीला  को देखने सिर्फ बनारस के लोग ही नहीं जाते बल्कि दूसरे जिलों और राज्यों से भी लोग आते हैं । यहां तक कि विदेशियों के लिए ये रामलीला बेहद कौतूहल भरी होती है । इस रामलीला के किरदार पूरी रामलीला के दौरान भगवान की तरह पूजे जाते हैं...मानो स्वयं राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न बाल रूप में विराजमान हों ।
बोलो सियावर रामचंद्र की जय

Tuesday, September 25, 2018

काशी की सेहत का मसीहा है वो...


काशी की सेहत का मसीहा है वो...

                                           
                                          बीएचयू का निर्माणाधीन कैंसर ह़ॉस्पिटल

कभी कहा जाता था कि मन चंगा तो कठौती में गंगा लेकिन अब ये कहावत होनी चाहिए तन चंगा तो कठौती में गंगा, यानी तन स्वस्थ हो तो सबकुछ ठीक है । देश के प्रधानमंत्री और वाराणसी के सांसद नरेंद्र मोदी शायद इसी कहावत को अपनी जिंदगी में उतार चुके हैं और चाहते हैं कि सब कोई स्वस्थ रहे । इसी कड़ी में अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में स्वास्थ्य को लेकर उन्होंने जो क्रांतिकारी काम शुरू किए हैं, वो अबसे पहले शायद ही किसी एक शहर के लिए किए गए होंगे । वाराणसी जो पूर्वांचल और बिहार से सटे जिलों में सबसे बड़ा जिला है । इसी वजह से यहां के एकमात्र सरकारी सुपर मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल सरसुंदरलाल अस्पताल उर्फ बीएचयू हॉस्पिटल पर मरीजों का दबाव बना रहता है । बीएचयू में ओपीडी के लिए सुबह से लंबी लाइन, ऑपरेशन के लिए महीनों का इंतजार और टेस्ट के लिए लंबी तारीख और गंभीर बीमारी की इलाज के लिए पर्चे पर REFER TO AIIMS DELHI ये आम बात हो चली थी । इसी दबाव को देखते हुए और वाराणसी को मेडिकल हब यानी स्वास्थ्य का केंद्र बनाने के लिए पीएम मोदी ने वाराणसी के लिए जो भागीरथ प्रयास शुरू किया है वो धीरे-धीरे साकार होने की दिशा में है । एक एक कर बताते हैं कि वाराणसी कैसे बनेगा मेडिकल हब

-      वाराणसी में अबसे पहले कैंसर का इलाज बीएचयू में होता था लेकिन उसके लिए एक छोटा सा विभाग था लेकिन सुविधाएं और तकनीक कम थी । इसके अलावा रेलवे का कैंसर अस्पताल था, जिसमें बाहरी मरीजों का इलाज नहीं होता था । पीएम मोदी ने आते ही सबसे पहले काम यही किया है कि रेलवे के कैंसर अस्पताल को मुंबई के टाटा कैंसर अस्पताल के हाथों सौंपा दिया है जिससे तकनीक और अत्याधुनिक हो जाए । इसके अलावा सबसे बड़ा काम ये किया कि बीएचयू में एक अलग कैंसर अस्पताल का भी उद्घाटन कर दिया । इसकी जिम्मेदारी भी टाटामेमोरियल कैंसर हॉस्पिटल के हाथों में होगी । गरीब मरीजों के लिए मुफ्त इलाज की सुविधा होगी । 2019 में ये संस्थान काम करना शुरू कर देगा ।
-    - वाराणसी में एम्स की मांग लंबे वक्त से हो रही थी चूंकि वो गोरखपुर के हिस्से आ गया लिहाजा पीएम मोदी ने बीएचयू को एम्स जैसी सुविधाएं दिलाने का संकल्प लिया । इसके लिए स्वास्थ्य मंत्रालय(एम्स) और शिक्षा मंत्रालय(बीएचयू) के बीच करार हो चुका है । अब इसके फायदे समझिए जरा । पहले सरकार की ओर से हर एक बेड के लिए 2 लाख रुपये सालाना दिए जाते थे लेकिन अब ये बढ़कर 20 लाख रुपए सालाना होगा । इससे मरीजों को अच्छी सुविधाएं मिलेंगी । नए स्टाफ, डॉक्टर की भर्ती की जाएगी । बेड की संख्या भी बढ़कर 700 हो जाएगी । इसके अलावा बोनमैरो, किडनी, लिवर व पैंक्रियाज जैसे ट्रांसप्लांट व स्टेम सेल चिकित्सा की सुविधा भी यहां उपलब्ध होगी ।
-    इसके अलावा बीएचयू को किस तरह से एम्स के बराबर करने की तैयारी उसके लिए नीचे दिए गए चीजें जरूर पढ़िए

                                               


-    - 450 बेड का एक सुपर स्पेशियलिटी कॉम्पेल्क्स निर्माणाधीन है
-    -100 बेड का एक अलग मदर-चाइल्ड सेंटर बन रहा है
-    40 बेड का दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल जैसा बर्न वॉर्ड बन रहा है ।
-    - इसके अलावा एक मेंटल हॉस्पिटल का भी प्रस्ताव है ।
-    - अभी तक बीएचयू में आंख के लिए एक डिपार्टमेंट यानी विभाग था लेकिन अब बकायदा नेत्र विभाग को एक अलग संस्था का दर्जा मिल चुका है यानी संस्था के लिए अलग फंड होगा, अलग बिल्डिंग होगी और सिर्फ नेत्र के क्षेत्र में रिसर्च होंगे । मतलब आंख के मरीजों के लिए फायदा ही फायदा ।
ऊपर लिखी तमाम योजनाएं लगातार जारी हैं, बीएचयू में घूमकर उन्हें देखा जा सकता है । अब अंदाजा लगाइए कि जब बीएचयू इन तमाम सुविधाओं के साथ काम करने लगेगा तो वाराणसी क्या पूर्वांचल और बिहार के लोगों को दिल्ली का चक्कर नहीं लगाना होगा । वायरल बुखार के इलाज से लेकर बोन मैरो ट्रांसप्लाट तक बीएचयू में हो जाएगा । शायद इसीलिए ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि बनारस को मिल गया मोदी के रूप में उसका भागीरथ

Thursday, August 30, 2018

बनारस को मिल गया भागीरथ(पार्ट 2)



अब से करीब 200 साल पहले बनारस से होते हुए दुनिया के सबसे लंबे हाईवे का निर्माण कराया था शेरशाह सूरी ने । उसके बाद वाराणसी में सड़कों का निर्माण तो हुआ लेकिन किसी नामी हाईवे को लेकर कोई काम नहीं हुआ । आज से करीब 16 साल पहले अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने वाराणसी से होते हुए फिर एक जबरदस्त हाईवे का निर्माण कराया, जिसे नाम दिया गया स्वर्णिम चतुर्भुज(गोल्डन क्वाडिलेट्रल) ये देश के चारो महानगरों को जोड़ती है । इस सड़क के निर्माण के बाद एक बार फिर वक्त ठहर सा गया । किसी हाईवे का निर्माण बनारस या उसके आस-पास के जिलों में नहीं किया गया, जबकि ये माना जाता है कि हाईवे विकास की सड़क होती है । 2014 में नरेंद्र मोदी के वाराणसी का सांसद और देश का प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद देश में हाईवे का जाल बिछाने के महाअभियान की फिर से शुरूआत हुई । इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी जिम्मेदारी सौंपी सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को । पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को इसके आस-पास के जिलों से आवागमन आसान बनाने के लिए हाईवे के जाल बनाने का संकल्प नितिन गडकरी ने लिया । आपको एक-एक कर बताते हैं कि बनारस के आस पास हाइवे का कितना घना जाल बना रहे हैं सांसद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
-      वाराणसी से जौनपुर को जोड़ने वाली सड़क, जो बाबतपुर हवाई अड्डे से होकर गुजरती है, उसे 4 लेन से 8 लेन में बदलने का काम तेजी से चल रहा है

-      वाराणसी में जाम की समस्या को देखते हुए वाराणसी के बाहरी इलाकों से होते हुए रिंग रोड फेज 1(16 किलोमीटर) का काम 90 फीसदी पूरा हो चुका है, जबकि रिंग रोड फेज2 (53 किमी.) लंबा काम शुरू हो चुका है ।
-      वाराणसी से गोरखपुर जाने वाली सड़क(सवा दो सौ किलोमीटर) जोकि 2 लेन की थी उसे भी 4 लेन करने का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है ।
-      वाराणसी से आजमगढ़ जाने वाली दो लेन सड़क(177 किमी.) को 4 लेन हाइवे में तब्दील करने का काम चल रहा है।
-      बनारस-सुल्तानपुर फोर लेन का काम भी शुरू हो चुका है, ये सड़क लखनऊ जाने के लिए समय को कम कर देगी ।
-      वाराणसी से बिहार के औरंगाबाद को जोड़ने के लिए 6 लेन का हाईवे बनाने का प्रस्ताव पास हो चुका है ।
-      वाराणसी-शक्तिनगर को जोड़ने वाली सड़क(117 किलोमीटर) को 6 लेन के हाईवे में तब्दीन करने का काम भी तेजी से चल रहा है, हालांकि ये सड़क यूपी सरकार बना रही है, हालांकि इसका श्रेय भी मोदी सरकार को जाता है ।
-      इन सबके अलावा स्वर्णिम चुतुर्भुज की सड़क जो इलाहाबाद हंडिया से होते मोहनसराय बाईपास होते हुए चंदौली तक जाती है, उसके हंडिया-चंदौली तक का रास्ता जो पहले 4 लेन का था उसे 6 लेन का काम अंतिम चरण में है
-      कुल मिलाकर वाराणसी को उसके आस-पास के जिलों से मजबूत और चौड़ी सड़क से जोड़ने से न सिर्फ वाराणसी का विकास होगा बल्कि उसके आस-पास के जिले भी विकसित होंगे ।
-      अगली कड़ी में आपको बताऊंगा कि स्वास्थ्य के मामले में कैसे बनारस को उसका भागीरथ मिल गया है

Wednesday, August 22, 2018

...बनारस को उसका भागीरथ मिल गया (पार्ट 1)



जिस तरह से गंगा को शिवजी की जटाओं से धरती पर लाने का काम भागीरथ ने किया था। ठीक उसी तरह बनारस यानी वाराणसी यानी काशी में विकास की गंगा बहाने का काम किया है उसके सांसद और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने। बनारस की पहचान भले ही मोदी के वाराणसी के सांसद बनने से कई सौ सालों पहले से हो लेकिन ये भी सच है कि वाराणसी का जितना नाम पिछले 4 सालों में लिया गया है, उतना शायद ही पहले कभी लिया गया हो । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सौभाग्य है कि वाराणसी ने उन्हें अपना सांसद चुना और ये वाराणसी का अहोभाग्य है कि नरेंद्र मोदी ने अपने सांसद और प्रधानमंत्री बनने का आभार विकास की गंगा के रूप में जताया । वाराणसी में जिस पैमाने पर विकास के काम हो रहे हैं उसका एक चौथाई भी अब से पहले तक नहीं हुआ था । वाराणसी में हुए विकास कामों का एक-एक विवरण दूंगा आपको ताकि आपको पता लग सके कि आखिर एक प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र और दुनिया के सबसे पुराने जिंदा शहर का जब मिलन होता है तो आखिर वो कैसा दिखता है । शुरुआत वाराणसी में रेलवे के विकास से ।
-   देश की पहली महामना एक्सप्रेस वाराणसी को मिली, जो दूसरे रेलवे कोच के मुकाबले बेहद आधुनिक और सुविधाजनक है । महामना एक्सप्रेस नई दिल्ली से वाराणसी के लिए शुरू की गई ।


-   वाराणसी में कैंट रेलवे स्टेशन के पुनर्निर्माण का काम चल रहा है । प्लेटफॉर्म नंबर 1 को आधुनिक बनाया जा रहा है, इसके साथ ही कैंट रेलवे स्टेशन पर प्लेटफॉर्म का भी विस्तार किया जा रहा है । स्टेशन पर स्वचालित सीढ़ियां भी लगाई गई हैं ।
-   वाराणसी के मंडुआडीह से शिवगंगा एक्सप्रेस पहले से चलती थी लेकिन स्टेशन नाम मात्र का बनाया गया था। मोदी सरकार आने के बाद इस स्टेशन का कायापलट हो गया। अब इसे फाइव स्टार स्टेशन बनाने की दिशा में काम चल रहा है । प्लेटफॉर्म पर सुंदरता के अलावा, नए प्लेटफॉर्म का निर्माण, नई बिल्डिंग का निर्माण आदि काम तेजी से चल रहा है ।

-   वाराणसी में रेलवे का कायापलट करने के लिए वाराणसी से इलाहाबाद को जोड़ने वाली सिंगल लाइन को न सिर्फ डबल लाइन करने का काम तेजी से चल रहा है बल्कि उसके विद्युतीकरण का भी काम भी जारी है । इससे इलाहाबाद से आने-जाने वाली ट्रेनों का समय कम लगेगा ।
-   वाराणसी के आस पास के छोटे छोटे स्टेशनों पर भी विकास के काम चल रहे हैं । इसके अलावा वाराणसी के काशी स्टेशन को भी मॉडल स्टेशन बनाने का काम शुरू हो गया है । काशी स्टेशन गंगा नदी के किनारे हैं, यहां से सड़क मार्ग और जल मार्ग को जोड़ने का प्रोजेक्ट है, जिस पर काम चल रहा है ।
-   वाराणसी की पहचान है मालवीय सेतु यानी राजघाट का पुल चूंकि ये अंग्रेजों के जमाने में बनाया गया था लिहाजा रेलवे ने इस पुल के समानांतर एक पुल बनाने को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है । इसके निर्माण में समय लगेगा लेकिन ये भी जल्द मूर्त रूप ले लेगा ।
-   इसके अलावा वाराणसी के पास गाजीपुर जिले में भी रेलवे के विकास के कई काम हुए हैं ।
-   कुल मिलाकर वाराणसी के लिए रेलवे की ओर से बहुत से काम किए जा रहे हैं । इसके पीछे एक वजह पीएम मोदी हैं तो दूसरी ओर वाराणसी के बीएचयू से पढ़े और गाजीपुर के सांसद मनोज सिन्हा जो कि रेल राज्य मंत्री हैं उनकी मेहनत है ।
-   वाराणसी के लोगों के लिए इससे बेहतर क्या हो सकता है कि रेलवे के लिए जोरदार काम पीएम मोदी ने किया है, जिसका सीधा फायदा बनारस की आम जनता को होगा ।
-   अब अगली कड़ी में आपको बताऊंगा कि वाराणसी में सड़कों लिए सांसद नरेंद्र मोदी ने क्या-क्या किया है
-    

Friday, August 10, 2018

चुनाव आने वाले हैं राहुल मंदिर जाने वाले हैं

                                          सोमनाथ मंदिर में राहुल गांधी          फाइल फोटो


मंदिर में हाथ जोड़े खड़े हैं, सफेद पायजामा कुर्ता पहने(राजनीतिक चोला है) । पंडित जी प्रसाद देते हैं, कुछ देर आंख बंद और फिर चल दिए। अपने असली काम चुनावी रैली के लिए । बीते दो चुनाव(गुजरात और कर्नाटक) के दौरान राहुल गांधी की रणनीति यही रही है, टेंपल रन की । अब देश में चुनाव के दौर एक बार फिर से शुरू होने जा रहा है और इस बार दौर लंबा चलेगा । मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के बाद सिर पर लोकसभा चुनाव आ जाएगा । ऐसे में वोटरों को लुभाना राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है । कर्नाटक और गुजरात चुनाव के दौरान राहुल ने मंदिरों के इतने चक्कर काटे कि खुद कांग्रेस के लोग अचंभित होंगे ।  गुजरात चुनाव के दौरान तो राहुल गांधी ने राज्य के 20 से ज्यादा मंदिरों के दर्शन कर लिए । यहां तक कि राहुल ने खुद को शिवभक्त, जनेऊधारी ब्राह्ण भी कहा था । कर्नाटक चुनाव के दौरान भी राहुल गांधी ने मंदिरों के चक्कर लगाए थे । कर्नाटक चुनाव के दौरान राहुल ने ऐलान किया था कि वो मानसरोवर की यात्रा पर जाएंगे । सावन का महीना आ गया लोग मानसरोवर की यात्रा से होकर आ गए लेकिन राहुल कैलाश तो छोड़िए दिल्ली में भोलेनाथ के मंदिर तक नहीं गए । ऐसे में जनेऊधारी ब्राह्ण और शिवभक्त राहुल के लिए दिल्ली का एक मंदिर भी करोड़ों किलोमीटर दूर लग रहा होगा ।
अब देश में चुनावी सीजन की शुरुआत होने जा रही है सो राहुल की शिवभक्ति, भगवत भक्ति फिर जागने वाली है । मध्य प्रदेश के उज्जैन महाकाल से लेकर राजस्थान के मेहंदीपुर बालाजी के दर्शन कर आएंगे वो । एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के हर बड़े मंदिर में राहुल गांधी के दर्शन की तस्वीर अगले कुछ महीनों में टीवी पर दिखाई देंगी । फिर राहुल गांधी की राजनीतिक आस्था धार्मिक आस्था में बदल जाएगी । सवाल ये है कि क्या राहुल गांधी के लिए आस्था सिर्फ वोटों का सवाल है या फिर वाकई उनके मन में श्रद्धा है ?