Thursday, September 27, 2018


न बिजली, न लाउडस्पीकर फिर भी दुनिया की सबसे प्रसिद्ध रामलीला

राम लक्ष्मण भरत सीता और शत्रुघ्न

तालाब किनारे रामलीला का मंचन



गोधूलि बेला है...यानी उजाला खत्म होने की ओर है और अंधेरा दस्तक दे रहा है। मैदान में बने एक चौड़े चबूतरे पर पेट्रोमैक्स(गैस से जलने वाला लालटेन) रखा है, चबूतरे के नीचे मैदान में लोगों की भीड़ इकट्ठा है । भीड़ में कुछ लोगों के हाथ में रामचरितमानस की किताब है तो कोई अपने साथ जमीन पर बिछाने के लिए दरी लेकर आया है । थोड़ी देर में चबूतरे पर बाल स्वरूप में राम, सीता और लक्ष्मण का आगमन होता है और पूरे माहौल में जय श्रीराम और हर-हर महादेव के उद्घोष होने लगते हैं । पूरा वातावरण राम और शिवमय हो जाता है...और फिर शुरू होता है रामायण का प्रसंग । ये जगह है काशी की राजधानी रामनगर और मंच है रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला का ।
 काशी के दक्षिण में गंगा नदी के पार रामनगर है, रामनगर में ही काशी नरेश रहते हैं । इसीलिए इसे काशी की राजधानी भी कहते हैं । यहीं पर सन 1783 में काशी के तत्कालीन राजा महाराज उदित नारायण सिंह ने रामलीला शुरू करवाई थी, जो अब पूरी दुनिया में विख्यात है ।

रामलीला में जाते काशी नरेश अनंत नारायण सिंह

क्यों विख्यात है रामनगर की रामलीला ?

आज के दौर में जब दिल्ली की रामलीला में हनुमान को हवा में उड़ाने के लिए क्रेन और रावण की सोने की लंका दिखाने के लिए बहुत बड़ी एलईडी टीवी के साथ-साथ टीवी जगत के कलाकारों का इस्तेमाल हो रहा हैं । वहीं रामनगर की रामलीला देखकर लगेगा कि हम उस सदी में हैं जहां बिजली ही नहीं है । यहां की लीला पेट्रोक्स या मशाल की रोशनी में की जाती है । ऐसा नहीं है कि सिर्फ शाम को रामलीला होती है दिन में भी रामलीला का मंचन होता है । खास बात ये है कि रामलीला में किसी माइक या लाउडस्पीकर का प्रयोग भी नहीं किया जाता । रामलीला के पात्र ऐसे संवाद करते हैं कि आवाज 50 मीटर दूर बैठे व्यक्ति तक आसानी से पहुंच जाए । रामनगर की रामलीला की सबसे खास बात है उसके पात्र  । इसके पात्र 16 साल से कम उम्र के चुने जाते हैं । राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के पात्र तो ब्राह्मण ही चुने जाते हैं । रामलीला में लड़कियां हिस्सा नहीं लेती उनका किरदार भी लड़के ही निभाते हैं ।  मुख्य पात्रा रामलीला की तैयारी के समय से संन्यासी सा जीवन व्यतीत करते हैं ।

रामलीला की भाषा

वैसे तो बनारस की भाषा बनारसी भोजपुरी है लेकिन रामनगर की रामलीला अवधी भाषा में होती है । पात्रों को इसके लिए काफी पहले से प्रशिक्षण दिया जाता है । प्रशिक्षण के समय पात्रों से संस्कृति के श्लोक भी पढ़वाए जाते हैं, ताकि शुद्ध उच्चारण हो ।

रामलीला पात्रों के वस्त्र-अस्त्र

रामलीला के पात्रों के वस्त्र साधारण रामलीला जैसे चमकदार नहीं होते। उनकी सुंदरता अलग सी ही दिखती है । श्रृंगार में प्रयोग होने वाले आभूषण सोने-चांदी के होते हैं । वस्त्र, आभूषण और अस्त्र-शस्त्र काशी नरेश के किले में ही रखे जाते हैं। रामलीला के पात्रों को सजाने के लिए किसी केमिकल वाले सामान का प्रयोग नहीं होता और न ही किसी कंपनी के ब्रांडेड मेकअप का । चंदन और कुमकुम रंगों से ही रामलीला के पात्रों को सजाया जाता है ।

हर अध्याय के लिए अलग जगह

रामचरितमानस में अयोध्या, चित्रकूट, लंका, अशोक वाटिका  और पंचवटी का वर्णन होता है । इसीलिए रामनगर के 4 किलोमीटर के दायरे में इन नामों से जगह ही बना दिए गए हैं । जिस जगह का अध्याय उसी जगह पर आयोजित होता है । रामलीला के पात्रों कंधे पर बैठकर एक जगह से दूसरी जगह लाया और ले जाया जाता है ।

कब शुरू होती है रामलीला

वैसे तो रामलीला की तैयारियां सावन महीने से शुरू हो जाती है लेकिन पहला मंचन भादो महीने में अनंत चतुर्दशी के दिन से होता है । उस दिन काशी नरेश स्वयं राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के बालस्वरूप की पूजा करने हाथी पर सवार होकर आते हैं। काशी नरेश स्वयं भगवान के बालस्वरूप की आरती उतारते हैं । रामनगर की रामलीला अश्विन महीने की शुक्ल पूर्णिमा तक चलती है ।
कंधे पर राम लक्ष्मण सीता को ले जाते ब्राह्मण


दुनिया की आधुनिकता से दूर ये रामलीला आज भी अपने मूलस्वरूप में चल रही है । बनारस के फक्कड़ मिजाज लोग आज भी रामनगर की रामलीला में जाना नहीं भूलते । रामनगर में रामलीला देखना और वहीं पर लिट्ठी चोखा बनाकर खाना ठेठ बनारसियों की सालों पुरानी आदत है ।
चंदन का टीका लगाते दर्शक
रामनगर की रामलीला  को देखने सिर्फ बनारस के लोग ही नहीं जाते बल्कि दूसरे जिलों और राज्यों से भी लोग आते हैं । यहां तक कि विदेशियों के लिए ये रामलीला बेहद कौतूहल भरी होती है । इस रामलीला के किरदार पूरी रामलीला के दौरान भगवान की तरह पूजे जाते हैं...मानो स्वयं राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न बाल रूप में विराजमान हों ।
बोलो सियावर रामचंद्र की जय

Tuesday, September 25, 2018

काशी की सेहत का मसीहा है वो...


काशी की सेहत का मसीहा है वो...

                                           
                                          बीएचयू का निर्माणाधीन कैंसर ह़ॉस्पिटल

कभी कहा जाता था कि मन चंगा तो कठौती में गंगा लेकिन अब ये कहावत होनी चाहिए तन चंगा तो कठौती में गंगा, यानी तन स्वस्थ हो तो सबकुछ ठीक है । देश के प्रधानमंत्री और वाराणसी के सांसद नरेंद्र मोदी शायद इसी कहावत को अपनी जिंदगी में उतार चुके हैं और चाहते हैं कि सब कोई स्वस्थ रहे । इसी कड़ी में अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में स्वास्थ्य को लेकर उन्होंने जो क्रांतिकारी काम शुरू किए हैं, वो अबसे पहले शायद ही किसी एक शहर के लिए किए गए होंगे । वाराणसी जो पूर्वांचल और बिहार से सटे जिलों में सबसे बड़ा जिला है । इसी वजह से यहां के एकमात्र सरकारी सुपर मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल सरसुंदरलाल अस्पताल उर्फ बीएचयू हॉस्पिटल पर मरीजों का दबाव बना रहता है । बीएचयू में ओपीडी के लिए सुबह से लंबी लाइन, ऑपरेशन के लिए महीनों का इंतजार और टेस्ट के लिए लंबी तारीख और गंभीर बीमारी की इलाज के लिए पर्चे पर REFER TO AIIMS DELHI ये आम बात हो चली थी । इसी दबाव को देखते हुए और वाराणसी को मेडिकल हब यानी स्वास्थ्य का केंद्र बनाने के लिए पीएम मोदी ने वाराणसी के लिए जो भागीरथ प्रयास शुरू किया है वो धीरे-धीरे साकार होने की दिशा में है । एक एक कर बताते हैं कि वाराणसी कैसे बनेगा मेडिकल हब

-      वाराणसी में अबसे पहले कैंसर का इलाज बीएचयू में होता था लेकिन उसके लिए एक छोटा सा विभाग था लेकिन सुविधाएं और तकनीक कम थी । इसके अलावा रेलवे का कैंसर अस्पताल था, जिसमें बाहरी मरीजों का इलाज नहीं होता था । पीएम मोदी ने आते ही सबसे पहले काम यही किया है कि रेलवे के कैंसर अस्पताल को मुंबई के टाटा कैंसर अस्पताल के हाथों सौंपा दिया है जिससे तकनीक और अत्याधुनिक हो जाए । इसके अलावा सबसे बड़ा काम ये किया कि बीएचयू में एक अलग कैंसर अस्पताल का भी उद्घाटन कर दिया । इसकी जिम्मेदारी भी टाटामेमोरियल कैंसर हॉस्पिटल के हाथों में होगी । गरीब मरीजों के लिए मुफ्त इलाज की सुविधा होगी । 2019 में ये संस्थान काम करना शुरू कर देगा ।
-    - वाराणसी में एम्स की मांग लंबे वक्त से हो रही थी चूंकि वो गोरखपुर के हिस्से आ गया लिहाजा पीएम मोदी ने बीएचयू को एम्स जैसी सुविधाएं दिलाने का संकल्प लिया । इसके लिए स्वास्थ्य मंत्रालय(एम्स) और शिक्षा मंत्रालय(बीएचयू) के बीच करार हो चुका है । अब इसके फायदे समझिए जरा । पहले सरकार की ओर से हर एक बेड के लिए 2 लाख रुपये सालाना दिए जाते थे लेकिन अब ये बढ़कर 20 लाख रुपए सालाना होगा । इससे मरीजों को अच्छी सुविधाएं मिलेंगी । नए स्टाफ, डॉक्टर की भर्ती की जाएगी । बेड की संख्या भी बढ़कर 700 हो जाएगी । इसके अलावा बोनमैरो, किडनी, लिवर व पैंक्रियाज जैसे ट्रांसप्लांट व स्टेम सेल चिकित्सा की सुविधा भी यहां उपलब्ध होगी ।
-    इसके अलावा बीएचयू को किस तरह से एम्स के बराबर करने की तैयारी उसके लिए नीचे दिए गए चीजें जरूर पढ़िए

                                               


-    - 450 बेड का एक सुपर स्पेशियलिटी कॉम्पेल्क्स निर्माणाधीन है
-    -100 बेड का एक अलग मदर-चाइल्ड सेंटर बन रहा है
-    40 बेड का दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल जैसा बर्न वॉर्ड बन रहा है ।
-    - इसके अलावा एक मेंटल हॉस्पिटल का भी प्रस्ताव है ।
-    - अभी तक बीएचयू में आंख के लिए एक डिपार्टमेंट यानी विभाग था लेकिन अब बकायदा नेत्र विभाग को एक अलग संस्था का दर्जा मिल चुका है यानी संस्था के लिए अलग फंड होगा, अलग बिल्डिंग होगी और सिर्फ नेत्र के क्षेत्र में रिसर्च होंगे । मतलब आंख के मरीजों के लिए फायदा ही फायदा ।
ऊपर लिखी तमाम योजनाएं लगातार जारी हैं, बीएचयू में घूमकर उन्हें देखा जा सकता है । अब अंदाजा लगाइए कि जब बीएचयू इन तमाम सुविधाओं के साथ काम करने लगेगा तो वाराणसी क्या पूर्वांचल और बिहार के लोगों को दिल्ली का चक्कर नहीं लगाना होगा । वायरल बुखार के इलाज से लेकर बोन मैरो ट्रांसप्लाट तक बीएचयू में हो जाएगा । शायद इसीलिए ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि बनारस को मिल गया मोदी के रूप में उसका भागीरथ