Tuesday, October 16, 2018

नवरात्र में बनारस बन जाता है मिनी बंगाल

                             

        नवरात्र में बनारस बन जाता है मिनी बंगाल

पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा दुनिया भर में मशहूर है इसमें शक नहीं है लेकिन वाराणसी में भी दुर्गापूजा की रौनक पश्चिम बंगाल से जरा भी कम नहीं होती । बड़े-बड़े लाउडस्पीकर में बजते नवरात्र के गाने  किसी दूसरे के लिए शोर हो सकते हैं लेकिन वे बनारस के लिए रस धार की तरह होते हैं । नवरात्र पर बनारस की सड़कों और गलियों में लगी झालर और बत्तियां बत्तियां ऐसी लगती हैं मानों सूरज अलग-अलग रंगों में आंख मिचौली खेल रहे हों । बनारस में 1000 से ज्यादा छोटे-बड़े पंडाल और दुर्गा मूर्तियां प्रतिस्थापित की जाती हैं। इनमें से कई पंडाल और दुर्गा प्रतिमाएं बेहद ही आकर्षक और खूबसूरत होती हैं ।

सार्वजनिक दुर्गोत्सव समिति, टाउन हॉल

बनारस के प्राचीन दुर्गा पूजा में से एक है सार्वजनिक दुर्गोत्सव समिति की दुर्गा पूजा । टाउन हॉल के हॉल में लगने वाली इस दुर्गा पूजा की कई खासियत है । नवरात्र के पहले ही दिन मूर्ति की स्थापना की जाती है । पूरे दुर्गा पूजा के दौरान टाउन हॉल का हॉल किसी मंदिर की तरह बन जाता है, जहां लोग चप्पल उतारकर दर्शन करने जाते हैं । इस दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी पहचान थी यहां लगने वाली मूर्तियों की सुंदरता, वैसे तो हर दुर्गा जी की मूर्ति सुंदर होती है लेकिन यहां की मूर्ति का मुकाबला कहीं से नहीं किया जा सकता । मन करता था कि नौ दिन तक टाउन हॉल में ही रहूं और दुर्गा जी के सामने रहूं । टाउन हॉल की मूर्ति बनाते हैं विश्वनाथ मूर्ति कला केंद्र । फिलहाल 2015 के विवाद से टाउन हॉल ने बड़ी और मिट्टी की मूर्ति लगाने की परंपरा बंद कर दी । मुझे इसका झटका लगा । सार्वजनिक दुर्गोत्सव समिति की एक और खासियत है नौ दिनों तक चलने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम । साल 2004 तक सुबह और रात को श्रीकृष्णलीला का मंचन होता था लेकिन अब 9 दिनों तक भजन गायक अपनी प्रस्तुति देते हैं । इसके साथ टाउन हॉल के मैदान में मेला भी लगता है । 
सार्वजनिक दुर्गोत्सव समिति की ओर से लगाई गई मां की प्रतिमा

प्रीमियर ब्वॉयज क्लब, हथुआ मार्केट

बनारस का ये सबसे बड़ा दुर्गा पूजा क्लब है । इस क्लब की पहचान है इसका भव्य पंडाल सेट । साल दर साल हथुआ मार्केट का पंडाल अपनी भव्यता और विशेषता से लोगों को अंचभित कर देता है । मुझे अच्छे से याद है कि एक वर्ष पंडाल के रूप में करीब 100 फुंट ऊंचा शिवलिंग रूपी पंडाल बना था और उस शिवलिंग पर पानी गिरता रहता था । इसी तरह एक वर्ष पंडाल के रूप में श्रीकृष्ण का अर्जुन को उपदेश देते वक्त वाला दृश्य बना था । इस साल फिल्म बाहुबली के भव्य महल का पंडाल तैयार किया गया है । हर साल नंबर एक पंडाल का पुरस्कार प्रीमियम ब्वॉयज क्लब को ही मिलता है।
प्रीमियर ब्वॉयज क्लब - बाहुबली के महल जैसा पंडाल

विजेता स्पोर्टिंग क्लब, लहुराबीर

हथुआ मार्केट के सामने पुलिस लाइन में भी भव्य पंडाल बनता था और भव्य मूर्ति लगती थी जो पंडाल के मामले में दूसरे नंबर पर रहता था लेकिन अब यहां पर पुलिस कार्यालय बन गया है, जिसकी वजब से यहां पर अब दुर्गा प्रतिमा नहीं सजती । 

बाबा मच्छोदरानाथ दुर्गोत्सव समिति

मच्छोदरी पार्क में लगने वाली ये दुर्गा पूजा भी बनारस की सबसे भव्य दुर्गा पूजाओं में से एक है । यहां की खासियत होती है इसका भव्य पंडाल । देश के प्राचीन स्मारकों और मंदिरों की प्रतिकृति यहां पंडाल के रूप में दिखते रहे हैं । 
बाबा मच्छोदरानाथ समिति में बना पंडाल

मां बागेश्वरी देवी दुर्गा पूजा क्लब,जैतपुरा

बागेश्वरी देवी मंदिर परिसर में लगने वाली इस दुर्गा पूजा ने अपनी अलग ही पहचान बनाई है । इस पूजा समिति की खासियत होती है इसकी प्रतिमा जो हर बार लोगों को चौंकने पर मजबूर कर देती है । दरअसल यहां पर दुर्गा मूर्ति मिट्टी की बजाए किसी विशेष पदार्थ से बनाई जाती है । कुछ पुराने उदाहरण बता रहा हूं एक साल अमेरिकी डायमंड की मूर्ति, एक साल तांबे की मूर्ति, एक साल पेंसिल, रबड़ और कटर की मूर्ति, एक साल आग की मूर्ति (जी हां आग की मूर्ति सिलेंडर गैस पाइप से कनेक्टन थी और मूर्तियों में आग जलते थे)।  इस क्लब की मूर्तियों ने हमेशा लोगों को आकर्षित किया है ।
इसके अलावा सनातन धर्म इंटर कॉलेज में लगने वाली दुर्गा पूजा की भव्यता भी देखने लायक होती है । यहां की मूर्ति भी विशेष होती है।

ईगल क्लब, जंगमबाड़ी 

बंगाली समाज द्वारा जंगमबाड़ी मठ के सामने ईगल क्लब की दुर्गा मूर्ति स्थापित की जाती है, यहां की मूर्ति बेहद सुंदर होती हैं । यहां की मूर्ति की एक खासियत होती है कि यहां मां जगजननी हमेशा क्रोधित रूप में दिखती हैं और उनके सिर पर मुकुट नहीं होता ।
जगतगंज पर लगने वाली दुर्गा प्रतिमा की पहचान सड़क पर होने वाली लाइटिंग से है । इतना ही नही यहां पर इलेक्ट्रिक दुर्गा पूजा होती है, 10 मिनट का शो होता है । जिसमें दुर्गा जी के हाथों से त्रिशूल निकलकर महिषासुर को जाकर लगता है ।
बनारस शहर में प्रहलादघाट, पांडेयपुर, अर्दलीबाजार में भी आकर्षक और भव्य पंडाल बनाए जाते हैं और छोटी-छोटी सैकड़ों मूर्तियां गली मोहल्लों में लगती हैं । सप्तमी, अष्टमी और नवमी पर शाम के बाद आधा बनारसर शहर सड़कों पर होता है । कई परिवार तो रात के 12 बजे घुमने निकलते हैं । वाराणसी के आस-पास पड़ाव और मुगलसराय में भी बेहतरीन दुर्गा मूर्तियां और पंडाल लगते हैं । वाराणसी में दुर्गा पूजा एक ऐसा त्योहार जो लोगों को आपस जोड़ता तो है ही साथ ही उससे एक मिनी अर्थव्यवस्था भी फलती फूलती है जिससे हजारों लोगों की रोजी रोटी चलती है । 

Tuesday, October 9, 2018

मां गंगा के लिए आधुनिक भगीरथ हैं वो...



"न किसी ने मुझे भेजा है और ना मैं यहां आया हूं मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है"


2014 लोकसभा चुनाव के दौरान वाराणसी से पर्चा भरने से ठीक पहले नरेंद्र मोदी ने यही वाक्य कहा था । गंगा मईया की कृपा से वाराणसी से नरेंद्र मोदी को प्रचंड जीत मिली और पूरे देश में बीजेपी को प्रचंड बहुमत । बंपर जीत के बाद पीएम मोदी पर जिम्मेदारी थी कि वो गंगा मईया के उपकारों को कैसे चुकाएं । पीएम मोदी ने मां गंगा की सेवा करने का बीड़ा उठाया है । बीते साढ़े 4 साल में बनारस में गंगा के लिए वाराणसी के सांसद और प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ किया उतना तो इतने कम अंतराल में कभी नहीं हुआ ।
  वाराणसी में जीत के बाद पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे पहला काम मां गंगा को नमन करने का ही किया । उन्होंने मां गंगा की आरती की । इसके बाद दो ऐसे मौके आए जब पीएम मोदी अपने दो दोस्तों को गंगा किनारे लेकर आए । सबसे पहले दिसंबर 2015 में जापान के पीएम शिंजो आबे को वाराणसी ले आए और उन्हें गंगा की आरती दिखाई । इसके बाद इसी साल मार्च में प्रधानमंत्री मोदी अपने दोस्त फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को वाराणसी के घाटों की सैर करवाई और वो भी नाव पर बिठाकर ।



  जहां तक मेरी याददाश्त है मेरे सामने इससे पहले कभी किसी बड़े देश का राष्ट्राध्यक्ष वाराणसी नहीं आया था । बहरहाल ये बात घुमने घूमाने की हुई है लेकिन सवाल है कि गंगा के लिए उन्होंने अब तक क्या किया तो चलिए आपको गिनाते हैं पीएम मोदी के द्वारा शुरू कराए गम काम ।
  1.  वाराणसी के 84 घाटों पर हाई मास्ट बल्ब जलते थे जिनसे पीली छटाएं निकलती थीं जिससे रात में भी घाटों की सुंदरता निखरती थी । पीएम मोदी ने बिजली बचाने के लिए घाटों के बल्ब को एलईडी से बदलवाए । ये एलईडी सफेद रंग की रोशनी देते थे । वाराणसी शहर के लोगों ने इसकी शिकायत पीएमओ तक की, जिसके तुरंत बाद सफेद एलईडी लाइटों को पीली एलईडी लाइटों से बदलने में देर नहीं किया गया ।
  2. गंगा नदी में सीवर का पानी गिरता है इसमें कोई शक नहीं है बनारस में पहले से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट है लेकिन बनारस शहर से निकलने वाली गंदगी के हिसाब से उसकी क्षमता नहीं है । इसीलिए पीएम मोदी ने बनारस शहर के लिए तीन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को मंजूरी दी । सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से शहर के नालों का पानी साफ होगा और फिर उस साफ पानी को या तो गंगा में बहाया जाएगा या फिर उसे किसानों की खेतों तक पहुंचाया जाएगा।

-         3 नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बन रहे हैं

  •   दीनापुर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट – ये बनारस का सबसे बड़ा सीवर के पानी को साफ करने का प्लांट होगा । इसका काम 80 फीसदी तक पूरा हो चुका है ।
  • इसके बाद गोइठहा में भी सीवेज ट्रीटमेंट का काम पूरी रफ्तार से चल रहा है । दिसंबर तक इसका काम काम पूरा हो जाएगा।
  • इसके अलावा रमना में भी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का काम तेजी से चल रहा है ।

-               ये तीन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ऐसी जगहों पर बनाए जा रहे हैं जिससे पूरा शहर इसके जरिए कवर हो जाए । 
  
-                     इन तीनों ही सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के बन जाने से शहर के गंदे नालों का पानी सीधे ट्रीटमेंट प्लांट में गिरेगा और पानी साफ होगा।
  • पीएम मोदी ने गंगा की सफाई करने के लिए डेढ़ करोड़ की लागत से एक अमेरिकन मशीन, जिसे ट्रैस स्कीमर कहते हैं, काशी को दी है । ये मशीन गंगा की ऊपरी सतह से गंदगी की सफाई करती है ।
    गंगा में सफाई करती ट्रैस स्कीमर मशीन
  •  गंगा को साफ करने का अलावा पीएम मोदी की इच्छा है कि नदी मार्ग का विकास हो जिससे यातायात का एक नया साधन बने साथ ही औद्योगिक सामान भी गंगा के जरिए पहुंचे । इसी के तहत पश्चिम बंगाल के हल्दिया से लेकर वाराणसी तक एक जलमार्ग का निर्माण हो रहा है । रामनगर के पास इसके लिए बकायदा एक बंदरगाह तैयार हो रहा है । जहां हल्दिया से आया माल उतरेगा और सड़क मार्ग से आगे जाएगा ।
  • अगले छह महीने के भीतर गंगा नदी के जरिए इलाहाबाद तक जाने का साधन भी उपलब्ध होगा सड़क परिवहन और जल संसाधन मंत्रालय की ओर से ।
  •  इन सबके अलावा अस्सी घाट की स्वच्छता और उसे नया रूप देना भी पीएम मोदी की ही देन है । पहले अस्सी पर चाय की दुकान पर अड़ी लगती थी लेकिन अब लोग अस्सी घाट पर शाम को वक्त बीताना पसंद करते हैं ।
    अस्सी घाट से गंगा का नजारा
  • मोदी सिर्फ गंगा नदी के प्रति ही गंभीर नहीं हैं बल्कि उन्हें शहर के प्रसिद्ध तालाब और कुंडों की भी उतनी ही परवाह है तभी जो दुर्गाकुंड का बदला स्वरूप उन्हीं की देन है । जहां शाम होते ही अब बैठने का मन करता है । इसके अलावा शहर के दूसरे प्राचीन तालाबों को भी हृदय योजना की तरह सजाया-संवारा गया है ।

  • रात के समय दुर्गाकुंड तालाब का एक दृश्य

 पीएम मोदी के साथ-साथ केंद्रीय सड़क परिवहन और जल संसाधन मंत्री भी उनके साथ इस  काम में जी जान से जुटे हुए हैं । काशी में गंगा के पुर्नउद्धार के लिए जितने भी काम चल रहे हैं वो सभी 2014 के बाद से शुरू हुए हैं । ऐसे में ये कहना बिल्कुल ही जायज  होगा कि नर्मदा नदी के राज्य का एक इंसान वाकई गंगा के लिए आधुनिक भागीरथ साबित हो रहा है । 

 हर हर गंगे


Monday, October 1, 2018


         काशी का नाम मुहम्मदाबाद रखने की भी साजिश हुई थी



द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से है एक काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की महिमा अपरंपार है । काशी के कण कण में शंकर विराजते हैं । काशी तो स्वयं भोलेनाथ के त्रिशूल पर बसी है। ऐसी मान्यता है कि प्रलय आ जाए तो भी काशी नष्ट नहीं होगी । दुनिया के जीवित सबसे पुराने शहर...काशी की पवित्रता पर कई बार चोट भी पहुंचाने की कोशिश की गई और इसमें मुस्लिम शासकों का हाथ था ।

काशी विश्वनाथ मंदिर पर औरंगजेब ने सन 1669 में आक्रमण कर उसे काफी नुकसान पहुंचाया था । औरंगजेब ने मंदिर को ध्वस्त करवा दिया और मंदिर की सिर्फ एक दीवार छोड़ दी और उसी जगह मस्जिद खड़ी करवा दी । उस दौरान मंदिर के पुरोहितों ने शिवलिंग को बचाने के लिए उसे ज्ञानवापी कुएं में छिपा दिया था । मस्जिद से सटी मंदिर की एक दीवार अब भी मौजूद है, जो काशी विश्वनाथ मंदिर की सत्यता को उजागर करता है, हालांकि सुरक्षा घेरा होने के कारण वहां अब लोगों को जाने नहीं दिया जाता । विश्वनाथ मंदिर में लगी नंदी बैल की मूर्ति का मुख अभी भी उसी दिशा में है, जहां अब ज्ञानवापी मस्जिद है । हिंदू धर्म में मान्यता है कि शिवलिंग की दिशा में ही नंदी का मुख है । ऐसे में ये दो मुख्य सबूत बताने के लिए काफी हैं कि प्राचीन विश्वनाथ मंदिर उसी जगह पर मौजूद था, जहां आज मस्जिद है ।
नंदी के पीछे दिख रहा वर्तमान विश्वनाथ मंदिर

ऐसा कहा जाता है कि मुस्लिम आक्रांता औरंगजेब ने काशी का नाम बदल दिया था । उसने इस पवित्र शहर का नाम मुहम्दाबाद रख दिया था, लेकिन काशी की पवित्रता के आगे वो नाम चलन में नहीं आ सका ।

मौजूदा विश्वनाथ मंदिर

तस्वीरों में आप जो विश्वनाथ मंदिर अभी देखते हैं उसका निर्माण प्राचीन विश्वनाथ मंदिर से कुछ दूरी पर किया गया है । साल 1777 में इंदौर की राजकुमारी अहिल्याबाई होलकर ने मौजूद मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर के शिखर पर सोने की चादरें बिछाई गई हैं जिसे पंजाब के राजा रणजीत सिंह ने दान में दिया था । महाराजा रणजीत सिंह ने 22 टन सोने से मंदिर के शिखरों को स्वर्ण मंडित कराया था ।

ऐसा नहीं है कि विश्वनाथ मंदिर पर आक्रमण करने वाला औरगंजेब पहला आक्रांता था । इससे पहले भी कई बार विश्वनाथ मंदिर पर आक्रामण किए गए । इतिहासकारों के मुताबिक सन् 1194 में मुहम्मद गोरी ने विश्वनाथ मंदिर को लूटने के बाद तुड़वा दिया था । इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया।  सन् 1585  में राजा टोडरमल की सहायता से पंडित नारायण भट्ट ने इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। जिसके बाद औरंजगेब ने 1669 में आदेश देकर विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया था और उसके सैनिकों ने प्राचीन काशी विश्वनाथ मंदिर को गिराकर उस जगह मस्जिद बना दी ।
ज्ञानवापी मस्जिद और उसकी एक दीवार

मौजूदा काशी विश्वनाथ मंदिर के पास आज जो मस्जिद है उसे ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है, जबकि स्कंद पुराण के काशी खंड में ज्ञानवापी को तीर्थ कहा गया है । ज्ञानवापी शब्द ज्ञान+वापी से मिलकर बना है जिसका मतलब होता है ज्ञान का तालाब या ज्ञान का कुंड ।

वैसे काशी और उसके नाथ यानी विश्वनाथ की महिमा अनंत और अपरंपार है । मंदिर और मस्जिद के विवाद से अलग एक बात जो शाश्वत सत्य है कि काशी सदियों से लोगों की आस्था और अध्यात्म का केंद्र रही है और आगे भी रहेगी...क्योंकि शिव में काशी है..काशी में शिव है ।

(लेख में सभी तथ्यों का चयन बेहद गंभीरता पूर्वक किया गया है)