सोमनाथ मंदिर में राहुल गांधी फाइल फोटो
मंदिर
में हाथ जोड़े खड़े हैं, सफेद पायजामा कुर्ता पहने(राजनीतिक
चोला है) । पंडित जी प्रसाद देते हैं, कुछ
देर आंख बंद और फिर चल दिए। अपने असली काम चुनावी रैली के लिए । बीते दो चुनाव(गुजरात
और कर्नाटक) के दौरान राहुल गांधी की रणनीति यही
रही है, टेंपल रन की । अब देश में चुनाव के दौर एक बार फिर से शुरू होने जा रहा है
और इस बार दौर लंबा चलेगा । मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के बाद सिर पर
लोकसभा चुनाव आ जाएगा । ऐसे में वोटरों को लुभाना राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी
चुनौती है । कर्नाटक और गुजरात चुनाव के दौरान राहुल ने मंदिरों के इतने चक्कर
काटे कि खुद कांग्रेस के लोग अचंभित होंगे ।
गुजरात चुनाव के दौरान तो राहुल गांधी ने राज्य के 20 से ज्यादा मंदिरों के
दर्शन कर लिए । यहां तक कि राहुल ने खुद को शिवभक्त, जनेऊधारी ब्राह्ण भी कहा था ।
कर्नाटक चुनाव के दौरान भी राहुल गांधी ने मंदिरों के चक्कर लगाए थे । कर्नाटक
चुनाव के दौरान राहुल ने ऐलान किया था कि वो मानसरोवर की यात्रा पर जाएंगे । सावन
का महीना आ गया लोग मानसरोवर की यात्रा से होकर आ गए लेकिन राहुल कैलाश तो छोड़िए
दिल्ली में भोलेनाथ के मंदिर तक नहीं गए । ऐसे में जनेऊधारी ब्राह्ण और शिवभक्त
राहुल के लिए दिल्ली का एक मंदिर भी करोड़ों किलोमीटर दूर लग रहा होगा ।
अब
देश में चुनावी सीजन की शुरुआत होने जा रही है सो राहुल की शिवभक्ति, भगवत भक्ति
फिर जागने वाली है । मध्य प्रदेश के उज्जैन महाकाल से लेकर राजस्थान के मेहंदीपुर
बालाजी के दर्शन कर आएंगे वो । एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के हर
बड़े मंदिर में राहुल गांधी के दर्शन की तस्वीर अगले कुछ महीनों में टीवी पर दिखाई
देंगी । फिर राहुल गांधी की राजनीतिक आस्था धार्मिक आस्था में बदल जाएगी । सवाल ये
है कि क्या राहुल गांधी के लिए आस्था सिर्फ वोटों का सवाल है या फिर वाकई उनके मन
में श्रद्धा है ?

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