Tuesday, September 25, 2018

काशी की सेहत का मसीहा है वो...


काशी की सेहत का मसीहा है वो...

                                           
                                          बीएचयू का निर्माणाधीन कैंसर ह़ॉस्पिटल

कभी कहा जाता था कि मन चंगा तो कठौती में गंगा लेकिन अब ये कहावत होनी चाहिए तन चंगा तो कठौती में गंगा, यानी तन स्वस्थ हो तो सबकुछ ठीक है । देश के प्रधानमंत्री और वाराणसी के सांसद नरेंद्र मोदी शायद इसी कहावत को अपनी जिंदगी में उतार चुके हैं और चाहते हैं कि सब कोई स्वस्थ रहे । इसी कड़ी में अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में स्वास्थ्य को लेकर उन्होंने जो क्रांतिकारी काम शुरू किए हैं, वो अबसे पहले शायद ही किसी एक शहर के लिए किए गए होंगे । वाराणसी जो पूर्वांचल और बिहार से सटे जिलों में सबसे बड़ा जिला है । इसी वजह से यहां के एकमात्र सरकारी सुपर मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल सरसुंदरलाल अस्पताल उर्फ बीएचयू हॉस्पिटल पर मरीजों का दबाव बना रहता है । बीएचयू में ओपीडी के लिए सुबह से लंबी लाइन, ऑपरेशन के लिए महीनों का इंतजार और टेस्ट के लिए लंबी तारीख और गंभीर बीमारी की इलाज के लिए पर्चे पर REFER TO AIIMS DELHI ये आम बात हो चली थी । इसी दबाव को देखते हुए और वाराणसी को मेडिकल हब यानी स्वास्थ्य का केंद्र बनाने के लिए पीएम मोदी ने वाराणसी के लिए जो भागीरथ प्रयास शुरू किया है वो धीरे-धीरे साकार होने की दिशा में है । एक एक कर बताते हैं कि वाराणसी कैसे बनेगा मेडिकल हब

-      वाराणसी में अबसे पहले कैंसर का इलाज बीएचयू में होता था लेकिन उसके लिए एक छोटा सा विभाग था लेकिन सुविधाएं और तकनीक कम थी । इसके अलावा रेलवे का कैंसर अस्पताल था, जिसमें बाहरी मरीजों का इलाज नहीं होता था । पीएम मोदी ने आते ही सबसे पहले काम यही किया है कि रेलवे के कैंसर अस्पताल को मुंबई के टाटा कैंसर अस्पताल के हाथों सौंपा दिया है जिससे तकनीक और अत्याधुनिक हो जाए । इसके अलावा सबसे बड़ा काम ये किया कि बीएचयू में एक अलग कैंसर अस्पताल का भी उद्घाटन कर दिया । इसकी जिम्मेदारी भी टाटामेमोरियल कैंसर हॉस्पिटल के हाथों में होगी । गरीब मरीजों के लिए मुफ्त इलाज की सुविधा होगी । 2019 में ये संस्थान काम करना शुरू कर देगा ।
-    - वाराणसी में एम्स की मांग लंबे वक्त से हो रही थी चूंकि वो गोरखपुर के हिस्से आ गया लिहाजा पीएम मोदी ने बीएचयू को एम्स जैसी सुविधाएं दिलाने का संकल्प लिया । इसके लिए स्वास्थ्य मंत्रालय(एम्स) और शिक्षा मंत्रालय(बीएचयू) के बीच करार हो चुका है । अब इसके फायदे समझिए जरा । पहले सरकार की ओर से हर एक बेड के लिए 2 लाख रुपये सालाना दिए जाते थे लेकिन अब ये बढ़कर 20 लाख रुपए सालाना होगा । इससे मरीजों को अच्छी सुविधाएं मिलेंगी । नए स्टाफ, डॉक्टर की भर्ती की जाएगी । बेड की संख्या भी बढ़कर 700 हो जाएगी । इसके अलावा बोनमैरो, किडनी, लिवर व पैंक्रियाज जैसे ट्रांसप्लांट व स्टेम सेल चिकित्सा की सुविधा भी यहां उपलब्ध होगी ।
-    इसके अलावा बीएचयू को किस तरह से एम्स के बराबर करने की तैयारी उसके लिए नीचे दिए गए चीजें जरूर पढ़िए

                                               


-    - 450 बेड का एक सुपर स्पेशियलिटी कॉम्पेल्क्स निर्माणाधीन है
-    -100 बेड का एक अलग मदर-चाइल्ड सेंटर बन रहा है
-    40 बेड का दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल जैसा बर्न वॉर्ड बन रहा है ।
-    - इसके अलावा एक मेंटल हॉस्पिटल का भी प्रस्ताव है ।
-    - अभी तक बीएचयू में आंख के लिए एक डिपार्टमेंट यानी विभाग था लेकिन अब बकायदा नेत्र विभाग को एक अलग संस्था का दर्जा मिल चुका है यानी संस्था के लिए अलग फंड होगा, अलग बिल्डिंग होगी और सिर्फ नेत्र के क्षेत्र में रिसर्च होंगे । मतलब आंख के मरीजों के लिए फायदा ही फायदा ।
ऊपर लिखी तमाम योजनाएं लगातार जारी हैं, बीएचयू में घूमकर उन्हें देखा जा सकता है । अब अंदाजा लगाइए कि जब बीएचयू इन तमाम सुविधाओं के साथ काम करने लगेगा तो वाराणसी क्या पूर्वांचल और बिहार के लोगों को दिल्ली का चक्कर नहीं लगाना होगा । वायरल बुखार के इलाज से लेकर बोन मैरो ट्रांसप्लाट तक बीएचयू में हो जाएगा । शायद इसीलिए ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि बनारस को मिल गया मोदी के रूप में उसका भागीरथ

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